फर्क भावना का
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मैं मानवता का पुजारी ,
मानवता के हत्यारे तुम ।
मै पक्षधर अहिंसा का ,
हिंसा के पुजारी तुम ।
मैं बढाता प्रेम भाव ,
नफरत का बाजार लगाते तुम ।
कैसे पटे तुम्हारी मेरी ,
लाशों का अंबार लगाते तुम ।
मैं बौता बीज सदभाव के ,
बाग में आग लगाते तुम ।
बाते होती जब देश की ,
अलगाववाद फैलाते तुम ।
- बाबूलाल गोले प्रजापति, इन्दौर
By- RK Prajapati
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